तुमने मेरे लिए क्या किया ?

हमने तुम्हारे लिए क्या नहीं किया,
वक़्त का खेल समझूँ या किश्मत का,
अब भी पूछते हो हमने तुम्हारे लिए क्या किया।

अब व्यर्थ की व्याख्या का क्या फायदा,
पहले की ही तरह सह लिया करेंगे थोड़ा और ज्यादा।

आज मालूम हुआ,
उस दिन रोता देख भी तुम क्यूँ न आये,
मेरे गहरे जख्म पर भी क्यूँ नहीं मरहम लगाए।

तुम्हें मुहब्बत नहीं या हमारा इश्क़ कम है,
जाने ज़िन्दगी में क्यूं इतने गम है,
लाख कोशिशें की, आँखे फिर भी नम है।

शायद मेरी ख़ामोशी ही मेरे जख्मों का मरहम है।