कहकशें के रस्ते में अकेली भटक रही थी
बेबस और लाचार मैं बहुत तड़प रही थी
वक्त का सिलसिला चलता जा रहा था
कोई रहनुमा न नजर आ रहा था
मैं अकेली तन्हापन में
बातें करती मन ही मन में
ऐ ख़ुदा एक मौका दे दे
कोई फ़रिश्ता तोहफ़ा दे दे
किसको बताऊँ अपने ग़म का सबब मैं
सहती रही हर ज़ुल्म-ओ-सितम मैं
तलब थी उसके रूह में बस जाने की
बेबाक़ उसके ज़िस्म को छू जाने की
न मिटी प्यास न मिटा तलब
न मिली मोहब्बत न मिला ज़िस्म
अनजान परेशान मैं भटक रही थी
क़भी सहम रही थी क़भी तड़प रही थी
न जहन्नुम में जगह थी न ज़न्नत मिल रही थी
किसी मझधार में मेरी कश्ती डूब रही
ऐ ख़ुदा इक रहम बख़्स दे
इस डूबती कश्ती को कोई किनारा दे दे
मुझ बेबस को कोई सहारा दे दे।।