तन्हापन

जो नीर बहे थे तन्हापन में
एक ज्वाला थी मेरे तन मन में
बेबाक मोहब्बत सरे आम किया था
फिर क्यूँ तुमने हमें नीलाम किया था
जो कभी अज़नबी थे वो भी तुम्हारे क़रीब हो गए
भला हम क्यों इतने बदनसीब हो गए
प्यार की भी अब इंतेहा हो गयी
दूरियाँ कुछ यूँ हमारे दरमियाँ हो गयी
की हर रोज़ तुम्हारे नाम इक पैग़ाम लिखते थे
सोच कर ये की तुम खफ़ा न हो जाओ, उसे बंद पन्नों में ही मसरूफ़ रखते थे
ऐसी नौबत आ गयी कि तुम अब छुपकर मुस्कुराने लगे
हर छोटी चीज़ भी हमसे छुपाने लगे
बेवफ़ा तो हम हरगिज़ न थे, फिर भी तुम हमसे इतनी दूरियाँ बनाने लगे।।